Holashtak: फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक के आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह समय बहुत ही सेंसिटिव माना जाता है, इसलिए इन दिनों में शादी, गृह प्रवेश, सगाई और नामकरण संस्कार जैसे शुभ काम नहीं किए जाते हैं। इसके पीछे दो मुख्य पौराणिक कहानियाँ प्रचलित हैं: भक्त प्रह्लाद की कहानी और कामदेव के भस्म होने की कहानी। इन दोनों घटनाओं में भक्ति, तपस्या और संयम का गहरा संदेश छिपा है। भक्त प्रह्लाद की कहानी तो सभी जानते हैं, लेकिन आज इस आर्टिकल में हम कामदेव के भस्म होने की कहानी के बारे में जानेंगे।
भगवान शिव और कामदेव से जुड़ी पौराणिक कहानियां
होलाष्टक से जुड़ी दूसरी कहानी भगवान शिव और कामदेव से जुड़ी है। पौराणिक कहानियों के अनुसार, माता सती की मृत्यु के बाद भगवान शिव गहरे ध्यान में चले गए। उसी समय राक्षस तारकासुर का अत्याचार बढ़ गया। देवता जानते थे कि उसे केवल शिव का पुत्र ही मार सकता है, इसलिए उन्होंने शिव की तपस्या भंग करने का एक तरीका निकाला।
देवताओं के कहने पर कामदेव ने अपने फूलों के बाणों से भगवान शिव का ध्यान भंग करने की कोशिश की। जैसे ही शिव का ध्यान भंग हुआ, उन्होंने गुस्से में अपनी तीसरी आँख खोल दी। कामदेव उस दिव्य ज्वाला में भस्म हो गए। अपनी पत्नी रति के विलाप करने पर, शिव खुश हुए और उन्हें "अनंग" यानी सूक्ष्म रूप में फिर से जीवित कर दिया। यह कहानी दिखाती है कि तपस्या, संयम और आत्म-नियंत्रण की शक्ति सबसे ऊपर है।
इसी वजह से होलाष्टक के दिनों को ध्यान और आत्मनिरीक्षण का समय माना जाता है। कामुक सुखों और शुभ कामों से दूर रहकर, व्यक्ति को अपने मन और इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसी तरह, भक्त प्रह्लाद का अटूट विश्वास और कामदेव को जलाने की घटना, दोनों ही होलाष्टक के आठ दिनों को खास बनाते हैं और दिखाते हैं कि यह बाहरी जश्न के बजाय अंदरूनी शुद्धि और भक्ति का समय है।
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