Rajasthan News: राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। लेकिन इस बार चुनाव की राह इतनी आसान नहीं लग रही है। हाड़ौती इलाके के किसान संगठनों ने चुनाव का बिगुल बजने से पहले ही मांगों की लिस्ट के साथ सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।

किसानों का साफ कहना है कि पंचायतें गांवों की सरकार भले ही हों, लेकिन जब तक किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं होता, इन चुनावों का उनके लिए कोई मतलब नहीं है। इस आंदोलन की रणनीति ने प्रशासन और राजनीतिक पार्टियों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

वो मुद्दा जो चुनावी 'गेम चेंजर' बन सकता है

हाड़ौती के किसानों के गुस्से के केंद्र में केशवराय पाटन शुगर मिल है, जो सालों से बंद है। किसान नेताओं का आरोप है कि वे दशकों से मिल को फिर से खोलने की मांग कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ खोखले वादे और निराशा ही मिली है। अब किसानों ने साफ कह दिया है कि अगर चुनाव की तारीखों से पहले मिलों को फिर से शुरू करने की कोई साफ डेडलाइन या ठोस रोडमैप घोषित नहीं किया गया, तो वे न सिर्फ वोटिंग का बायकॉट करेंगे बल्कि सड़कों पर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भी करेंगे। यह मुद्दा अब सिर्फ खेती का नहीं बल्कि हाड़ौती की पहचान और इज्जत का भी सवाल बन गया है।

किसान सम्मान निधि, इंश्योरेंस क्लेम की फाइलें अटकी

"धरती के बेटों" की शिकायतों की लिस्ट सिर्फ शुगर मिल से कहीं ज़्यादा लंबी है। किसान संगठन प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत पैसे मिलने में देरी, फसल इंश्योरेंस क्लेम न मिलने और मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP) पर खरीद में रुकावट को लेकर भी गुस्से में हैं।

बिजली और पानी की कमी ने आग में घी डालने का काम किया है। किसान संगठनों के अधिकारी अब गांव-गांव जाकर मीटिंग कर रहे हैं और गांववालों को इकट्ठा कर रहे हैं ताकि चुनाव से पहले सरकार पर अपनी मांगें पूरी करने के लिए ज्यादा से ज्यादा दबाव डाला जा सके। उनका आरोप है कि कई योग्य लाभार्थियों को अभी भी स्कीमों का अधूरा फायदा मिल रहा है।

क्या समीकरण बिगड़ेंगे? सरकार पर बढ़ता दबाव

राजस्थान में पंचायती राज चुनाव आमतौर पर लोकल और जाति-आधारित फैक्टर पर निर्भर करते हैं, लेकिन इस बार किसानों के मुद्दे इन पर भारी पड़ते दिख रहे हैं। अगर हाड़ौती इलाके के किसान मिलकर विरोध करने का फैसला करते हैं, तो इसका सीधा असर जिला परिषद और पंचायत समिति सीटों पर पड़ेगा।

गांव के वोटरों का यह "मूड" आने वाले बड़े राजनीतिक बदलावों का संकेत दे सकता है। इसलिए, राज्य सरकार के पास किसानों से सीधे बात करने के अलावा कोई चारा नहीं है। अगर चीनी मिलों और बकाया पेमेंट जैसे मुद्दों पर जल्द ही कोई ठोस फैसला नहीं लिया गया, तो पंचायत चुनाव से पहले हाड़ौती की सड़कों पर किसान आंदोलन हो सकता है।

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